Aravalli Hills: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला | अरावली में खनन पर रोक और सतत विकास नीति 2025
Aravalli Hills: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला | अरावली में खनन पर रोक और सतत विकास नीति 2025
Aravalli Hills: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 9 मई 2024 के आदेश के तहत गठित समिति की सिफारिशों और 12 अगस्त 2025 के आगे के निर्देशों पर नवंबर से दिसंबर 2025 में अपने आदेश में विचार किया। यह विचार विशेष रूप से अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान (यूनिफॉर्म) नीति स्तरीय परिभाषा बनाने और संबंधित राज्य सरकारों की राय को शामिल करने के लिए किया गया।
इस समिति का नेतृत्व पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MOEF&CC) ने किया। समिति में दिल्ली केंद्रशासित प्रदेश के साथ-साथ गुजरात, हरियाणा और राजस्थान के वन विभागों के सचिव शामिल थे। इसके अलावा भारतीय वन सर्वेक्षण, केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के प्रतिनिधियों ने भी इसमें भाग लिया।
न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला के पर्यावरणीय महत्व को बेहद अहम बताते हुए कहा कि यह क्षेत्र मरुस्थलीकरण को रोकने वाली एक प्राकृतिक सुरक्षा दीवार है। साथ ही अरावली भूजल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत है और जैव विविधता के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास भी प्रदान करती है।
Aravalli Hills की महत्व
दिल्ली से हरियाणा राजस्थान और गुजरात तक फैली Aravalli Hills और पर्वतमालाएं भारत की सबसे प्राचीन भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से एक हैं। ऐतिहासिक रूप से राज्य सरकारों ने इन्हें 37 जिलों में मंजूरी दी है। इनकी भूमिका उत्तर भारत में जल पुनर्भरण जैव विविधता की रक्षा और मरुस्थलीकरण को रोकने में महत्वपूर्ण रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनियंत्रित खनन “देश की पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा” है और समान नियम बनाने का आदेश दिया है। यही कारण है कि अरावली का संरक्षण पर्यावरणीय संतुलन सांस्कृतिक विरासत और निरंतर विकास की जरूरत है।
MOEF&CC समिति की रिपोर्ट का विशेष महत्व
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत गठित MOEF&CC समिति ने अरावली क्षेत्र से संबंधित विषयों पर अलग-अलग राज्य सरकारों के साथ व्यापक चर्चा की और उनके विचारों व सुझावों को गंभीरता से अपनी रिपोर्ट में शामिल किया। इससे पता चला कि अरावली क्षेत्र में खनन को नियंत्रित करने की औपचारिक परिभाषा केवल राजस्थान राज्य ने बनाई है।
2002 की राज्य समिति की रिपोर्ट जो Richard Murphy Landforms वर्गीकरण का उपयोग करती थी इस परिभाषा का आधार था। इसके अनुसार स्थानीय धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले सभी भू-आकृतियों को पहाड़ी माना जाता था और पहाड़ियों और उनके साथ जुड़े ढलानों पर खनन करना गैरकानूनी था। 9 जनवरी 2006 से राजस्थान इस परिभाषा का पालन कर रहा है।
विचार विमर्श के दौरान सभी राज्यों ने फैसला किया कि अरावली क्षेत्र में खनन को नियंत्रित करने के लिए “स्थानीय धरातल से 100 मीटर ऊंचाई” का मानदंड लागू किया जाए। जो राजस्थान में 09.01.2006 से लागू है। साथ ही इसे अधिक वस्तुनिष्ठ (ऑब्जेक्टिव) और पारदर्शी बनाया जाए।
- 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को घेरने वाली सबसे निचली कंटूर रेखा के भीतर स्थित किसी भी भू-भाग उनकी ऊंचाई या ढलान चाहे जो भी हो खनन पट्टे के लिए अयोग्य होंगी।
- इसी तरह दो ऐसी पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के भीतर स्थित सभी भू-भाग को अरावली पर्वतमाला कहा जाता है। इस 500 मीटर क्षेत्र में आने वाली सभी भूमि संरचनाएं भी खनन के लिए प्रतिबंधित होगा।
इसलिए 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली सभी जमीन पर खनन करना गलत होगा। राजस्थान में लागू परिभाषा को और मजबूत पारदर्शी तथा संरक्षण केंद्रित बनाने के लिए समिति ने कई सुधार सुझाए।
जिनमें शामिल हैं-
- स्थानीय धरातल निर्धारित करने के लिए वस्तुनिष्ठ, स्पष्ट और वैज्ञानिक मानदंड
- पर्वतमालाओं (Ranges) का स्पष्ट संरक्षण जो पहले की परिभाषा में नहीं था
- खनन से पहले सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शों पर अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं का आवश्यक अंकन
- कोर या स्पर्शनीय (Inviolate) क्षेत्रों जहां खनन पूरी तरह से प्रतिबंधित होगा
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अवैध और सतत खनन को रोकने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश
20/11/2025 को अपने आखिरी फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कमेटी और टेक्निकल कमेटी के काम की तारीफ की और गैर-कानूनी माइनिंग को रोकते हुए सिर्फ सस्टेनेबल माइनिंग की इजाज़त दी। जब तक पूरे अरावली क्षेत्र के लिए सतत खनन प्रबंधन योजना MPSM नहीं बनाई जाती न्यायालय ने नए खनन पट्टों पर आस्थाई रोक लगा दी।
परिचालन परिभाषाएं (Operational Definitions)
अरावली पहाड़ियां
अरावली जिले में 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली कोई भी भूमि पहाड़ी कहलाती है। इसके लिए स्थानीय धरातल का निर्धारण सबसे निचली कंटूर रेखा के आधार पर किया जाएगा जो उस क्षेत्र को घेरती है। इस कंटूर के भीतर आने वाली पूरी भूमि—पहाड़ी उसकी सहायक ढलानें और संबंधित भू-आकृतियां — अरावली पहाड़ियों का हिस्सा है।
अरावली पर्वतमाला
अरावली पर्वतमाला दो या दो से अधिक अरावली पहाड़ियों से मिलकर बनती है जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर हैं। बीच में ढलानें छोटी पहाड़ियां और अन्य भूमि संरचनाएं भी पर्वतमाला का हिस्सा होंगे।
इन परिभाषाओं में पर्यावरणीय सुरक्षा भी शामिल है। इससे पारिस्थितिक क्षरण को रोकने के लिए सभी महत्वपूर्ण भू-आकृतियां ढलानें और उनसे जुड़े हुए आवास कानूनी संरक्षण में रहेंगे।
पर्यावरणीय लाभ
- पूरी जमीन की सुरक्षा: 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों और उनकी ढलानों को सुरक्षित रखना।
- संयुक्त पर्वतमाला संरक्षण: 500 मीटर के भीतर स्थित पहाड़ियों को एक साथ संरक्षित कर घरों की निरंतरता बनाए रखना
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आधिकारिक मानचित्रण: सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शों से सीमाएं स्पष्ट और लागू करने योग्य।
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कोर और संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा: स्वत संरक्षित क्षेत्र, टाइगर रिज़र्व, इको-सेंसिटिव क्षेत्र, आर्द्रभूमि और CAMPA वृक्षारोपण क्षेत्र हैं।
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण आदेश (20.11.2025)
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पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की प्रस्तावित परिभाषा को औपचारिक रूप से मान्यता दी है।
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कोर या अस्पर्शनीय क्षेत्रों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध (कुछ खनिजों को छोड़कर, जो विशेष रूप से देश के हित में हैं)
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अरावली क्षेत्र में केवल निरंतर खनन की अनुमति और अवैध खनन को रोकने के उपायों की अनुमति
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ICFRE द्वारा पूरे अरावली क्षेत्र के लिए सतत खनन प्रबंधन योजना MPSM बनाने के लिए दिशानिर्देश
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MPSM के अंतिम रूप तक नए खनन पट्टों पर प्रतिबंध लगाना
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साथ ही समिति की सिफारिशों के अनुसार पहले से चल रहे खदानों को संचालित करने का निर्देश भी दिया गया है।
अरावली को कैसे बचाया जाए
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नई खनन लीज पर रोक
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संरक्षित क्षेत्रों और इको-सेंसिटिव क्षेत्रों में पूरी तरह से प्रतिबंध
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ड्रोन, CCTV, वे-ब्रिज और जिला टास्क फोर्स की निगरानी
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भूजल, वन और पर्यावरणीय प्रमाणपत्रों का कठोर पालन
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गैरकानूनी उत्खनन पर तत्काल कार्रवाई
निष्कर्ष:
आज पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राज्य सरकारों की मिलीभगत प्रयासों से अरावली पहाड़ियां सुरक्षित हैं। सरकार ने कहा कि अरावली की पारिस्थितिकी को कोई तत्कालीन खतरा नहीं है। वनीकरण इको-सेंसिटिव ज़ोन की सूचनाएं और खनन और शहरी गतिविधियों की कड़ी निगरानी से अरावली देश की प्राकृतिक धरोहर बनी रहती है।
भारत की इच्छा स्पष्ट है—वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए अरावली पहाड़ियों को बचाया जाएगा और विकास और संरक्षण के बीच एक संतुलन बनाए रखा जाएगा।
संदर्भ:
पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय:
अरावली पहाड़ियों और श्रेणियों को समान रूप से परिभाषित करने वाली समिति की रिपोर्ट
भारत का सर्वोच्च न्यायालयः
https://api.sci.gov.in/supremecourt/1995/2997/2997_1995_1_1502_66178_Order_20-Nov-2025.pdf
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